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आधुनिक भारत के प्रमुख किसान आंदोलन के बारे में पूरी जानकारी

आज हम जानेंगे आधुनिक भारत के प्रमुख किसान आंदोलन के बारे में, आधुनिक भारत के इतिहास में आजादी के लिए बहुत सारा वर्णन मिलता है लेकिन भारत की आजादी में किसान आंदोलन भी  महत्वपूर्ण हिस्सा है । अंग्रेज  भारत में आए थे व्यापार करने के लिए लेकिन उन्होंने व्यापार करते-करते राजनीतिक मामलों में भी हस्तक्षेप करने लगे और धीरे-धीरे भारत के अधिकांश भागों को अपने कब्जे में ले लिया और उस क्षेत्र पर शासन करने लगे ब्रिटिश इन्ही शासन के दौरान भारत के किसानों पर अधिक लगान (कर) तथा अन्य अत्याचार करने लगे इस अत्याचार से बचने के लिए किसानों ने आंदोलन करने लगते थे। ब्रिटिश सरकार और जमींदारों के खिलाफ समय-समय पर किसान आंदोलन चलते रहे। 
यहां पर हम आसान भाषा में भारत के प्रमुख किसान आंदोलन (peasant movement of india in hindi) के बारे में पढेंगे।
peasant movement in modern india in hindi

आधुनिक भारत के प्रमुख किसान आंदोलन (peasant movement of modern India)

नील आंदोलन (1857-60) - अंग्रेजी शासन के खिलाफ कृषकों का पहला आंदोलन था जो बंगाल में हुआ। यूरोपीय बाजारों में नील की मांग ज्यादा थी जिसकी पूर्ति के लिए किसानों द्वारा चावल की खेती की जगह नील की खेती करने पर मजबूर किया जाता था। जिस खेत में नील की खेती की जाती थी वहां के खेत बंजर हो जाते थे। करार के वक्त किसानों को थोड़ी सी रकम मिल जाती थी इस खेती से किसानों को पूरी तरह लाभ नहीं मिल पाता था। नील विद्रोह की पहली घटना बंगाल की नदिया जिले में स्थित गोविंदपुर गांव में सितंबर 1859 में हुई। स्थानीय नेता दिगंबर विश्वास एवं विष्णु विश्वास के नेतृत्व में किसानों ने विद्रोह कर दिया स्थित को देखते हुए सरकार ने नील आयोग का गठन किया इस प्रकार नील आंदोलन सफल रहा तथा 1860 में समाप्त हो गया नील की खेती करने वाले किसानों की पीड़ा की अभिव्यक्ति दीनबंधु मित्र के नील दर्पण में हुई।



कूका आंदोलन (1872) : आंदोलन पंजाब राज्य में चलाया गया था कूका आंदोलन के संस्थापक भगत जवाहर मल थे जिसको आगे चलकर बाबा राम सिंह ने इसे सफल बनाया।

पावना विद्रोह (1873-76) : पावना क्षेत्र जो पटसन की कृषि हेतु प्रसिद्ध था 50% से अधिक किसानों को सरकार के द्वारा जमीन पर कब्जे का अधिकार तथा तथा कुछ सीमा तक लगान में वृद्धि के लिए संरक्षण प्राप्त था भावना के किसानों को सरकार द्वारा मिली सुविधाओं के बावजूद भी जमींदारों के शोषण का शिकार होना पड़ता था जिसके कारण किसानों ने जमींदारों के खिलाफ आंदोलन चलाया। आंदोलनकारियों का नारा था कि 'हम महारानी सिर्फ महारानी के रजत होना चाहते हैं'। किसानों के प्रयासों से 1885 ईसवी में बंगाल रैयत कानून पारित हुआ।

मोपला विद्रोह (1921) : मोपला मालाबार तट के मुस्लिम कृषक थे मोपला मुस्लिम किसान थे और यहां के जमीदारी का अधिकार हिंदुओं के हाथों में था उन्होंने हिंदू जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किया विद्रोह का प्रमुख कारण लगान में उच्च दरें तथा अन्य दमनकारी तौर-तरीके थे। इस आंदोलन में कुछ राष्ट्रवादी नेता जैसे महात्मा गांधी शौकत अली मौलाना आजाद ने इसमें भाग गया किंतु मोपलाओ ने हिंदू जमीदार के खिलाफ हिंसक रूप लेने से राष्ट्रवादी नेताओं ने आंदोलन से अलग हो गए। इस तरह दिसंबर 1921 तक सरकार द्वारा आंदोलन का दमन कर दिया गया।

चम्पारण सत्याग्रह (1917) : चंपारण (बिहार) के किसानों से अंग्रेज बागान मालिकों ने एक करार कर रखा था जिसके अंतर्गत किसानों को अपने उपजाऊ कृषि क्षेत्र के 3/20 (20वें भाग का तीसरा हिस्सा) में भाग पर नील की खेती करनी होती थी इस पद्धति को तिनकठिया पद्धति के नाम से जाना जाता था। इस समझौते के तहत अंग्रेज बागान मालिकों ने भारी लगान की मांग की परिणाम स्वरूप विद्रोह शुरू हुआ। 1917 में चंपारण के राजकुमार शुक्ल ने चंपारण किसान आंदोलन का नेतृत्व गांधी जी को सौंपने के लिए लखनऊ में उनसे मुलाकात की इस तरह भारत में सत्याग्रह का प्रथम प्रयोग गांधी जी द्वारा चंपारण में किया गया। 
चंपारण में गांधी जी की ताकत को देखते हुए सरकार ने जुलाई 1917 में मामले की जांच के लिए एक आयोग स्थापित किया जिसके सदस्यों में गांधी जी भी शामिल थे इस तरह अंततः किसानों को तिनकठिया पद्धत से राहत मिली। चंपारण सत्याग्रह का गांधी जी द्वारा सफल नेतृत्व किए जाने से प्रभावित रवींद्र नाथ टैगोर ने उन्हें महात्मा की उपाधि से सुशोभित किया।

खेड़ा सत्याग्रह आंदोलन (1918) : आंदोलन गुजरात के खेड़ा जिले से शुरू होती है इसका नेतृत्व गांधी जी ने किया। 1917-18 में फसल खराब होने के बाद भी खेड़ा के किसानों से लगान की वसूली की जा रही थी, खेड़ा के कुनबी-पाटीदार किसानों ने सरकार से लगान में राहत की मांग की लेकिन उन्हें कोई रियायत नहीं मिली। गांधी जी के नेतृत्व में इंदूलाल याज्ञनिक और बल्लभ भाई पटेल के सहयोग से खेड़ा के किसानों ने आंदोलन शुरू कर दिया। गांधी जी के सत्याग्रह के आगे लाचार सरकार ने एक दस्तावेज जारी किया कि लगान उसी से वसूला जाए जो देने में समर्थ हो। इस प्रकार गांधी जी के नेतृत्व में आंदोलन सफल रहा खेड़ा में ही गांधी जी ने पहले प्रथम वास्तविक किसान सत्याग्रह की शुरुआत की थी।

अवध किसान आंदोलन : यह उत्तर प्रदेश का प्रमुख किसान आंदोलन था। गौरी शंकर मिश्र, इन्द्र नारायण द्विवेदी तथा मदन मोहन मालवीय के प्रयत्नों से फरवरी 1918 में अवध में उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन किया गया। बाद में जवाहरलाल नेहरू ने इसमे हिस्सा लेकर और शक्ति प्रदान की। इसका भी प्रमुख कारण अधिक लगान वसूली था। 1922 के आरंभ में  तक 'एका आंदोलन' के रूप में यह चलता रहा।

एका आंदोलन (1921-22) : एका आंदोलन 1921 में किसानों द्वारा उत्तर प्रदेश के हरदोई बहराइच सुल्तानपुर बाराबंकी तथा सीतापुर में चलाया जा रहा था। इस आंदोलन का नेतृत्व पिछड़ी जाति के मदारी पासी जैसे नेताओं के हाथों में था।

बारदोली सत्याग्रह (1928) : यह आंदोलन सूरत(गुजरात) के बारदोली तालुके में किसानों द्वारा 30% की बृद्धि लगान अदायगी के विरोध में आंदोलन चलाया गया। बारदोली के ही मेहता बंधुओं (कल्याण जी, कुंवर जी, दयाल जी) ने किसानों के समर्थन में 1922 से ही इस आंदोलन को चलाएं हुआ था। इस आंदोलन में कातिलराज (काले लोग) जनजाति के लोगों ने भी हिस्सा लिया। 4 फरवरी 1928 में मेहता बंधुओं ने इस आंदोलन का नेतृत्व वल्लभ भाई पटेल को प्रदान किया, बढ़ी हुई लगान के विरुद्ध सरकार को पत्र लिखकर पटेल ने जांच कराने की मांग की है। तत्कालीन वायसराय इरविन ने बम्बई के गवर्नर विल्सन को मामले को शीघ्र निपटाने का निर्देश दिया। अंततः लगान को घटाकर 6% कर दिया गया। बारदोली सत्याग्रह में महिलाओं ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया, यहां की महिलाओं ने ही वल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि प्रदान की थी।



तेभागा आंदोलन (1946) : द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे व्यापक खेतिहर आंदोलन के भागा आंदोलन था बंगाल के 19 जिलों में फैला था 60 लाख किसान इस आंदोलन के सहभागी बने थे। इस आंदोलन की शुरुआत त्रिपुरा के हसनाबाद से हुई मुख्यतः यह बंगाल में केंद्रित था। आंदोलन जो दारू के विरुद्ध बटाई दारू का आंदोलन था जिसे कंपाराम भवन सिंह जैसे नेताओं ने नेतृत्व प्रदान किया इसमें बटाईदारों ने यह मांग की कि उसे उपज का तिभागा अर्थात एक तिहाई(1/3) भाग प्रदान किया जाए।

बर्ली संघर्ष आंदोलन (1945) : इस आंदोलन का मुख्य कारण था किसानों की निर्धनता क्योंकि उनके द्वारा उच्च ब्याज दर पर लिए गए ऋण का भुगतान नहीं होने से उनकी अधिकांश जमीन जमीदार था महाजनों के अधिकार में चली गई थी।

दक्कन आंदोलन (1875) : यहां आंदोलन महाराष्ट्र राज्य में था जिसका प्रमुख कारण था अमेरिका को कपास निर्यात कराना।

पुनप्पा वायलार आंदोलन (1946) : यह आंदोलन केरल राज्य में हुआ था। इसमें जमींदारों के अत्याचार तथा निजाम शासन के खिलाफ चलाया गया आंदोलन था। इस आंदोलन की वजह से त्रावणकोर का भारत में विलय हो गया।
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